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                        महाराणा सांगा (संग्राम सिंह)   

 

महाराणा रायमल की मृत्यु के बाद उनका सबसे छोटा पुत्र महाराणा सांगा सिंहासन पर बैठे 24 मई 1509 को रायमल के पुत्र सांगा का राज्यभिषेक किया गया।  महाराणा सांगा का जन्म 12 अप्रेल 1482 कुम्भलगढ़ दुर्ग मे इतिहास में महाराणा सांगा के नाम से प्रसिद्ध महाराणा संग्रामसिंह के शरीर पर 80 घाव थे।

 

 

उस समय दिल्ली में लोदी वंश का सुल्तान सिकन्दर लोदी,  गुजरात में महमूदशाह बेगड़ा और मालवा में नासिरशाह खिलजी का शासन था।  सन् 1817 में सिकन्दर लोदी का देहान्त हो जाने पर उसका पुत्र इब्राहीम लोदी दिल्ली के तख्त पर बैठा । इब्राहीम लोदी महाराणा सांगा के बड़ते हुए साम्राज्य से विचलित था। एक समय के लिए महाराणा सांगा के राज्य की सिमाएं दिल्ली के आस पास तक फैल गयी गई थी। यह सब देखकर इब्राहीम लोदी ने तुरंत उसने बड़ी सेना के साथ मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी । राणा सांगा और इब्राहीम लोदी की सेना खातौली बुंदी नामक स्थान पर एक दूसरे के आमने सामने हुई। इस यु़द्ध में राणा सांगा ने लोदी की सेना को पराजित किया। दूसरे वर्ष इब्राहीम लोदी ने मेवाड़ पर चड़ाई के लिए फिर सेना भेजी  और बाड़ी नामक स्थान पर सेना एक दूसरे के आमने सामने हुयी। बाड़ी वर्तमान धौलपुर नामक जिले में है। इस युद्ध में इब्राहीम लोदी स्वयं नही आता है। जबकी वह अपने दो सेनिक मिया माखन व मिया हुसेन को भेजता हे जो इस युद्ध में मारे जाते है। और सांगा की इस युद्ध में विजय होती है।

सन् 1519 में मांडू के सुल्तान महमूद के साथ महाराणा सांगा की गागरौन के पास लड़ाई हुई जिसमें महाराणा विजयी हुए और उन्होंने सुल्तान को कैद कर लिया,  जिसे बाद में वापिस छोड़ा गया।  राणा सांगा के समय काबुल का शासक बाबर था जो तैमुर लंग के वंशज उमरशेख मिर्जा का पुत्र था। इसकी मां चंगेज खां के वंश से थी।

बाबर और इब्राहीम लोदी के बीच पानिपत का प्रथम युद्ध लड़ा गया। जिसमें बाबर की विजय होती है। और बाबर भारत में मुगल वंश की स्थापना करता है।

दिल्ली पर अधिकार करने के बाद बाबर ने उस समय के शक्तिशाली शासक राणा सांगा पर भी अधिकार जमाने हेतु आक्रमण किया16 फरवरी 1527 को बाबर और राणा सांगा के बिच बयाना का युद्ध लड़ा गया जिसमें राणा सांगा की विजय हुई और बाबर वहां से भाग गया। इस युद्ध के बाद मार्च 1527 को बाबर पूर्ण तैयारी के साथ पुनः सांगा से युद्ध करने के लिए खानवा के मैदान में सेना लेकर आया।

  वर्तमान में खानवा का मैदान रूपवास तहसील भरतपुर में स्थित हे, यह युद्ध भारत के इतिहास का एक निर्णायक युद्ध था जिसमे पूरा राजपुताना  एक संघ के रूप में लड़ा

राणा सांगा ने इस युद्ध से पहले पाती परवन की प्रथा चलायी जिसमे पुरे राजपूताने को सहायता के लिए बुलाया गया

सांगा की सहायता करने वाले साशक

अजमेर . पर्थविराज कच्च्वाहा

मेड़ता . रतनसिंह

गजनेर . अशोक परमार

मारवाड़ . राव गांगा के पुत्र मालदेव

चंदेरी . मेदिनिराय

इस युद्ध में पुरा राजपुताना बड़ी विरता के साथ लड़ा किन्तु बाबर के तोपखाने के सामने राजपूत सेनिक टीक नही पायें अन्त में महाराणा सांगा के  आंख में तीर लगने से सांगा मुर्छीत हो जाते है। उनके मुर्छीत हो जाने पर झाला अज्जा राज मुकुट धारण कर युद्ध लड़ते हे, और वीरगति को प्राप्त हो जाते है । इस पराजय से पूरे भारतवर्ष में मुगलों का राज्य स्थापित हो गया और बाबर स्थिर रुप से भारतवर्ष का बादशाह बना। 

कालपी नामक स्थान पर 30 जनवरी1528 को विष दिऐ जाने के कारण सांगा का स्वर्गवास हो गया।  उनको माण्डलगड़ भीलवाड़ा लाया गया जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया । यही पर सांगा का स्मारक बना हुआ है। राणा सांगा की मृत्यु के बाद महाराणा रतनसिंह द्वितीय मेवाड़ के महाराणा बने।

 

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